मंगलवार, 22 मई 2018

इसे कहते हैं न्याय ?

         
 
 माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय के नये मानदंड स्थापित किये हैं |शिक्षा  विभाग के  एक कनिष्ट अधिकारी की पत्नी ने वाद दायर किया था कि उसके स्वर्गीय पति का विभाग के उच्च अधिकारी द्वारा लगातार मानसिक उत्पीड़न किया गया  | उनहोंने बताया कि उनके विभाग वाले  उनके पति से आफ़िस में सुबह दस बजे से रात के दस बजे तक काम कराते थे |अवकाश के दिनों में भी काम के लिए बुला लिया जाता था | जरा सी गलती होने पर दण्डित  किया जाता था जिसके कारण उन्होंने आत्महत्या की है |
माननीय सर्वोच्च  न्यायालय  ने फैसला सुनाया है कि आपात स्थिति में ज्यादा काम लिया  जा सकता है और दण्डित भी किया जा सकता है | इसमें कुछ भी गलत नहीं है |
इसका मतलब है कि आठ घंटे के काम के नियम  कानून के कोई मायने नहीं हैं | यह भी ध्यान नहीं रखा गया है कि काम आपात स्थिति में नहीं रूटीन में काम कराया जा रहा है | यह अधिकारियों को कर्मचारियों के मनमाने तरीके से  उत्पीड़न करने के अधिकार को मान्यता प्रदान करने वाला है | इस श्रमिक विरोधी फैसले का विरोध किया जाना चाहिए | क्या मनुष्य मशीन है जो लगातार काम करता रहेगा ? मशीन भी आराम मांगती है लेकिन मेहनतकशों को आराम नहीं है | आराम को हराम समझा जाता है जबकि आराम के बाद ही कोई काम ठीक से किया जा सकता है | इसके अतिरिक्त हर आदमी एक सामजिक प्राणी भी है |समाज में रहने के लिए उसे कुछ जिम्मेदारियों का भी निर्वाह करना होता है उसे खुद को कार्यक्षम बनाये रखने के लिए भी शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए वक्त की दरकार होती है लेकिन कर्मचारियों को बोझ मानने वाली मानसिकता ने कम से कम कर्मचारियों से अधिक से अधिक काम लेने की नीति बना ली है और सर्वोच्च न्यायालय उस पर मुहर लगा रहा है | इस देश में भंयकर बेरोजगारी है अगर कर्मचारियों के काम के घंटे काम कर दिए जायें और बेरोजगारों को काम दे दिया जाए तो देश बहुत सारी समस्याओं से छुटकारा पा सकता है | आतंकवाद और अपराध कम हो सकते हैं, मंदी से निजात मिल सकती है| लेकिन ये नौजवानों  को रोजगार देना यहीं चाहते हैं |ये उन्हें अपराध के लिए लिए,आतंकवाद के लिए, अपनी  राजनीति चमकाने  के लिए भीड़ जुटाने के लिए  बेरोजगार बनाये रखना चाहते हैं | सर्वोच्च न्यायालय सरकार से ये पूछने  की बजाय कि जब उसके पास काम है तो नौजवानों को नौकरी  क्यों नहीं देती है? यह फैसला सुना रहा है कि किसी भी कर्मचारी से ज्यादा काम लिया जा सकता है| ये गलत नहीं है ? यही  सर्वोच्च न्यायालय अपने यहाँ न्यायाधीशों के रिक्त पदों को भरने के लिए तथा न्यायधीशों की संख्या बढ़ाने को  लेकर केंद्र सरकार के समक्ष गुहार लगाता रहता है |  जब खुद पे गुजराती है तो तकलीफ होती है लेकिन  दूसरों का दर्द महसूस नहीं होता है | आज  हालत ये है की एक ऑफिस में दस दस कंप्यूटर हैं लेकिन कर्मचारी एक या दो हैं |सरकार सोचती है कि उसने कपयूटीकरण कर दिया है काम ज्यादा होगा | ये कम्यूटर का क्या बिना ऑपरेटर के काम करेंगे ? असल में न्याय कहीं नहीं है सिर्फ फैसले सुनाये जा रहे हैं | न्याय होता तो मनुष्य के गरिमामय जीवन जीने के अधिकार की रक्षा की जाती | किसी भी आदमी से असीमित काम लेना उसके जीवन जीने के अधिकार का हनन नहीं तो ओर क्या है ?
हरामखोर कर्मचारियों अधिकारीयों का उदहारण देकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को सही ठहराने की कोशिश  नहीं की जानी चाहिए| निष्कलंक तो देवता भी नहीं होते हैं और मैं तो सिर्फ  इंसानों  के हक़ में बोल रहा हूँ ,शैतानों के हक़ में नहीं हूँ |