गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

भाषा से तीन पाँच

                                                    [1] 
        ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी डा० मनमोहन सिंह के नाम से स्कॉलरशिप दे रही है जिन्हें सत्तारूढ़ दल का अध्यक्ष नमूना कहता है| लेकिन भाषा की मर्यादा नहीं टूटती है |स्वघोषित राष्ट्रभक्त सोनिया गांधी को बार गर्ल, इटली की कुतिया और जर्सी गाय कहते हैं लेकिन भाषा की मर्यादा नहीं टूटती है | राहुल गांधी को हाई ब्रीड बछड़ा, पप्पू और औरंगजेब कहा जाए इसमें भी भाषा की मर्यादा नहीं टूटती है | जो वोट न दे वो पाकिस्तान चला जाए ऐसा कहने से भी भाषा की मर्यादा नहीं टूटती है | क्यों नहीं टूटती है ? इसीलिए नहीं टूटती है क्यूँकि यह संस्कारी भक्तों की संस्कारी भाषा है | लेकिन जब कोई उन्हें उनके घटिया कारनामों के लिए घटिया शब्द का इस्तेमाल करता है तो उन्हें अंतिम संस्कार की आग लग जाती है | अब आग जल रही है और जंगली लोग नाच कूद रहे हैं | मांस भून जाएगा तो सब मजे ले लेकर खाएंगे | फिर किसने क्या कहा किसी को कुछ याद ना रहेगा | इलैक्शन तुम रोज क्यों नहीं आते हो ? कुछ संस्कारी भाषा जनता भी सीख जाए तो इन नेताओं की रोज जूता पूजा हो |बतौर शायर जॉन आलिया के हवाले से मैं यही कहना चाहूँगा---- अखलाख ना बरतेंगे मुदारा ना करेंगे अब हम किसी शख्स की परवाह ना करेंगे | कुछ लोग कई लफ्ज गलत बोल रहे हैं इस्लाह मगर हम भी इस्लाह ना करेंगे | ------- जॉन आलिया                                                       

                                                               [2] 

न्यूज चैनल पर होने वाली बहसें भंयकर सिरदर्द पैदा करतीं हैं|एक कांग्रेस के प्रवक्ता को एक भाजपा प्रवक्ता, एक आर०आर0 एस० का कथित विचारक, एक हिन्दू धर्म का कथित संत कोई अन्य स्वयंभू हिन्दू हित रक्षक प्रवक्ता घेरे रहते हैं | स्वयं एंकर भी भाजपा कार्यकर्ता की भूमिका में रहता है और कांग्रेस प्रवक्ता को लगातार टोकता रहता है |जबकि अन्य प्रवक्ताओं को निर्बाध बोलने दिया जाता है |अन्य प्रवक्ता भी जब कांग्रेस प्रवक्ता को टोकते हैं तो एंकर चुपचाप तमाशा देखता है या उन्हें प्रोत्साहित करता है लेकिन जब कांग्रेस प्रवक्ता टोकता है तो उसे तुरंत खामोश कर दिया जाता है | लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक उनके दबाव में नहीं आती हैं |उनके कडा एतराज करने पर कथित संघ विचारक टी वी डिबेट भाग गए | ये समझ में नहीं आता है कि राजनीतिक बहसों में संघ के लोग किस हैसियत से भाग लेते हैं ? वो राजनीतिक लोग नहीं हैं और न ही चुनाव लड़ते हैं फिर क्यों उन्हें बुलाया जाता है ? एक सत्तारूढ़ दल को फालतू प्रवक्ताओं की स्पोर्ट की क्या जरुरत है ?कायदे से राजनीतिक डिबेट में सभी प्रमुख दलों के प्रतिनिधियों को बुलाया जाना चाहिए | बसपा जो टी वी डिबेट में भाग नहीं लेती है उसके आनुसांगिक संगठनों के प्रतिनिधि या हमदर्द प्रवक्ताओं को बुलाया जा सकता है | लेकिन टी वी डिबेट में कम्युनिष्ट पार्टियों समेत लगभग सभी राजनीतिक दलों को अलग रखा जाता है ये सही नहीं है | डिबेट को स्तरीय बनाने के लिए उसमें राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं के साथ साथ जन संगठनों -किसानों, मजदूरों ,युवाओं, महिलाओं, के प्रतिनिधियों को बुलाना चाहिए ताकि वो अपनी समस्याओं और आंकाक्षाओं पर राजनेताओं के ख्यालों से रूबरू हो सकें | न्यूज चैनल अच्छी राजनीतिक जागरूकता पैदा कर सकते हैं जो लोकतंत्र को जीवंत रखने के लिए आवश्यक है लेकिन वो ऐसा न करके सत्तारूढ़ दल के भोंपू बने हुए हैं |उनकी ऐसी हालत पर बहुत लज्जा आती है |                                                                                                                   [3]          
         कभी बाबर कभी औरंगजेब कभी अलाऊदीन खिलजी कभी मौहम्मद तुगलक जिधर देखो इन्हीं बादशाहों का नाम सुनाई दे रहा है |समझ में नहीं आता कि क्या पांच हजार साल पुरानी सभ्यता के वारिसों के इतिहास में कोई याद रखने लायक नाम नहीं बचा है जो वो उससे कोई उदाहरण दे सकें ? नायक और खलनायक तो वहाँ भी जरूर होंगे |कुछ नहीं तो दुर्योधन और दुशासन जैसे नाम हैं, शकुनि और चाणक्य हैं जयचंद और अमीचंद हैं उन्हें भी तो याद रखना चाहिए |