रविवार, 15 अप्रैल 2018

न हिन्दू न मुसलमां थे, ना सिख ना ईसाई थे

हम जिनके लिए लड़ रहे वो बहिन थी वो भाई थे |

हमें ना धर्म दीखता,निभा रहे हैं फर्ज को

इंसानियत का कर्ज है, चुका रहे हैं कर्ज को |



हमें शर्म कि लोग कुछ इंसानियत से हैं गिरे

हमारे ही तो भाई वे हैवानियत से जो घिरे |

गुनाह जो किये हैं वो सजा जरूर पायेंगे

मगर किसी मासूम की हँसी कहाँ से लाएंगे ?



यही तो एक दर्द है, बेचैन कर रहा है जो

कि वो भी आदमी धर्म पे मार मर रहा है जो |

किधर से आदमी है वो, लिए वो कौन सा धर्म ?

जरा भी जानता नहीं जो आदमीयत का मर्म |



जो आदमी है पहले वो बने तो एक आदमी

नहीं लगेगी फिर उसे किसी धर्म की कुछ कमी |

अगर बड़ा धर्म कोई तो धर्म आदमीयत है

इसी धर्म चलेगा वो कि जिसकी नेक नीयत है |